राजनीति के सिद्धान्तीकरण से आप क्या समझते हैं?
राजनीतिक सिद्धांत का महत्व
किसी भी विषय को स्वतंत्र अनुशासनात्मक स्तर दिए जाने के लिए 'सिद्धान्त' एक पूर्व अपेक्षा (prerequisite) या शर्त है।
Meta राजनीति के सिद्धान्तीकरण की प्रकृति, सिद्धांतों और उनकी विशेषताओं की विवेचना। डेविड ईस्टन के सिद्धांतों से लेकर आधुनिक और परंपरागत दृष्टिकोण तक, राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक रूप से समझने के लिए सिद्धान्तों का महत्व।
केवल वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग मात्र से अथवा तथ्यों आदि के विषय में पर्यवेक्षण, वर्णन या भविष्य कथन से ही कोई विषय एक शैक्षिक अनुसंधान नहीं बन जाता।
उसके पास अपना सुविकसित सिद्धांत होना चाहिए। 'आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत' (Modern Political Theory) राजनीति विज्ञान को स्वतंत्र अनुशासन बनाने की दिशा में पुरजोर संघर्षरत है, इसलिए उसका अध्ययन-विश्लेषण आवश्यक है।
डेविड ईस्टन और राजनीतिक सिद्धांत
डेविड ईस्टन ने राजनीतिशास्त्र में सिद्धांत की भूमिका और महत्व पर विशेष बल दिया है।
ईस्टन को ही यह श्रेय जाता है कि उसने सर्वप्रथम राजनीतिक सिद्धांत की आवश्यकताओं की ओर राजनीतिशास्त्रियों को आकर्षित किया।
ईस्टन के अनुसार सिद्धांत का निर्माण राजनीतिशास्त्र को व्यवस्थित विज्ञान बनाने की एक आवश्यक शर्त है और इसके अभाव में राजनीतिशास्त्र व्यक्तित्वहीन है।
परम्परागत और आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत
परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत
'आधुनिक राजनीति सिद्धांत' परम्परागत सिद्धांत से भिन्न है। परम्परागत राजनीतिशास्त्र में 'राजनीतिक सिद्धांत' के अन्तर्गत मूल्यों पर चिन्तन किया जाता रहा है।
परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत और राजनीतिक दर्शन पर्यायवाची कहे जा सकते हैं।
परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत अब तक इस प्रश्न के चारों ओर घूमता रहा कि किसे राज्य (शासन) करना चाहिए और क्यों?
तथ्य यह है कि परम्परागत राजनीति सिद्धांत के सभी विचारक राजनीतिक व्यवस्था का नैतिक औचित्य सिद्ध करने के प्रयास में व्यस्त रहे हैं।
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत
डेविड ईस्टन के अनुसार "किसी भी विज्ञान की अभिवृद्धि, आनुभविक अनुसंधान एवं सिद्धांत दोनों के विकास तथा उनके मध्य घनिष्ठ संबंध पर निर्भर करती है।"
शैक्षिक दृष्टि से राज सिद्धांत बढ़ते हुए अतितथ्यवाद तथा आंकड़ेबाजी से निपटने में सहायता दे सकता है।
तथापि राजनीति विज्ञान में तथाकथित राज सिद्धांत की स्थिति बड़ी शोचनीय है।
राबर्ट डहल के अनुसार "अंग्रेजी भाषा भाषी जगत में, राजनीतिक सिद्धांत मर चुका है, साम्यवादी देशों में वह नन्दी है और अन्यत्र मर रहा है।"
राजनीतिक सिद्धांतों के प्रकार
आदर्शी सिद्धांत
आदर्शी सिद्धान्तों में राजनीतिक व्यवस्थाओं के बारे में कोई कल्पना मस्तिष्क में कर ली जाती है और फिर उस कल्पना को रचनात्मक रूप दिया जाता है।
जैसे प्लेटो ने दार्शनिक राजाओं (Philosopher kings) की कल्पना की और फिर उस कल्पित आदर्श के आधार पर आदर्श राज्य की संरचना की।
आनुभविक सिद्धांत
आनुभविक सिद्धांतों में राजनीतिक व्यवहार के वास्तविक तथ्यों को समझकर सिद्धान्तों का निर्माण होता है।
राजनीतिशास्त्री स्वयं तथ्यों के संकलन के लिए राजनीतिक व्यवहार के क्षेत्र में जाकर राजनीतिक व्यवहार का अवलोकन करता है।
राजनीतिक सिद्धांत की विशेषताएँ
राजनीतिक सिद्धांत का दार्शनिक स्वरूप
अधिकांश राजनीति सिद्धांत दार्शनिक स्वरूप वाले क्यों हैं- इसके कई कारण हैं:
- राजनीतिक सिद्धांत के एक बहुत बड़े भाग का निर्माण राजनीतिक दार्शनिकों द्वारा किया गया है।
- ये दार्शनिक अन्ततोगत्वा राजनीतिक समाज के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों से सरोकार रखते थे।
- राजनीतिक समाज के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के बारे में निरन्तर वाद-विवाद एवं विचार-विमर्श अपेक्षित है।
राजनीतिक सिद्धांत का अवैज्ञानिक प्रकृति (स्वरूप)
विज्ञान यथार्थ के विवेचन की विधि है इसलिए प्रेक्षण, पर्यवेक्षण या अवलोकन पर आधारित है।
इस दृष्टि से अधिकांश राजनीतिक सिद्धांत वैज्ञानिक नहीं है।
परम्परागत और आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की प्रकृति
परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत
परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत अपने प्रतिपादक के व्यक्तित्व एवं दृष्टिकोण से प्रभावित रहे हैं।
उनका उद्देश्य सुधार, समर्थन या विरोध करना होता है।
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत अनुभववाद और वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित है।
यह राजनीति को दर्शन, कल्पना और इतिहास से दूर ले जाकर विज्ञान बनाने का प्रयत्न है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद व्यवहारवादी आन्दोलन ने आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन को नई दिशा प्रदान की।